किताबों से बचकर गुजरा नही जा सकता, ऐसा मैं मानता हूँ जैसे किसी बागीचे से गुजरते हुये हम फूलों की खुश्बू से बच नही सकते उसी तरह किताबें से नही बच सकते जीवन का निचोड़ होती हैं......... किताबें। रोजमर्रा की जिन्दगी में एक बार संतोष नही मिले, यश नही मिले, लेकिन किताबों से सामना हो ही जाता है।

कितनी ही ऐसी किताबें हैं जो अपने स्थानीय स्तर पर या कभी यूँ ही सिमटे हुये सर्क्यूलशन की वज़ह से वहाँ तक नही पहुँच पायी जहाँ उन्हें होना था वो आज भी अंजान हैं । हर एक किताब जीवन जीने के तरीके में बदलाव लाती है या जीवन के और करीब ले जाती है। इस ब्लॉग में ऐसी ही किताबों का जिक्र है मैंने जिन्हें पढ़ा, गुना या जिनसे जीवन जीना सीखा है, या मुझे पढ़ने को मिली और वो आपकी भी मदद कर सकेंगी............. इसी भावना से उनका जिक्र होना चाहिये बस यही प्रयास है...........।























रविवार, 16 सितंबर 2012

लखनऊ : जैसा देखा मैनें.....(भाग : 1)


यूँ तो किसी भी शहर में कुछ और अलग नही होता है...झूलती इमारतों, चौड़ी सड़कों, बड़े चौराहों और भागती कारों और बैचेन लोगों और बेतरतीब गंदगी के ढेरों के अलावा लगभग सभी की एक जैसी कहानी, वैसे भी हम जिसे गाँव कहते हैं उसमें ये सब तो नही होता है। तो लखनऊ में भी कुछ ऐसा ही होगा लेकिन अपना देस होने के कारण बड़ा करीब सा लग रहा था, मेरे बचपन का एक खासा हिस्सा गुजर गया है उन्नाव, कानपुर, लखनऊ और रायबरेली की किस्सागोई में कभी बुआ, कभी नाना, कभी दादा(मेरे बड़े ताऊ जी) तो कभी दद्दू(मेरे छोटे ताऊ जी) और इन सबसे मिलने आने वाले वो लोग जिनके हिस्से का शहर अभी पैदा ही नही हुआ था शहर में लेकिन सपनों में बसा हुआ था। ये सारे लोग अपनी जिंदगी में से कितना हिस्सा वहाँ देहात में छोड़कर आये थे और कितना यहाँ ले आए शायद इस प्रश्न का उत्तर मैं तो नही खोज पाऊंगा इस जन्म में।

इन्दौर (म.प्र.) का वो शहर जो व्यापारिक राजधानी कहा जाता है, वहाँ के परदेशीपुरा (वो क्षैत्र जहाँ कभी उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले प्रवासी पहले बसे थे) 1920~40 के उन दिनों कपड़ा मीलें अपने शबाब पर थी और ऐसा लगता था जैसे इन्दौर की कपड़ा मीलें शायद इन्हीं प्रवासियों के लिए ही खुली हों। बहरहाल इस बस्ती जिसमें फगुआ ऐसी तान छोड़ते थे कि कभी अकेले में भी याद आ जाए तो मन भीग जाता था रंग से, सावन डोलता था पेड़ों पर, गुड़िया लूटी जाती थी, बिरह दंगल होते थे, तीतर की लड़ाईयाँ, कजरी तीज, भुजरिया कुल मिलाकर यह कि अपना देस, अपने त्यौहार, अपनी परंपराएँ और अपने लोग सब कुछ वैसा ही था जैसा अपने देस में था। ऐसे ही एक परिवार का हिस्सा होते हुए मैंने न जाने कितनी बार उत्तर प्रदेश की यात्रा करता रहा इन्दौर में ही रहते हुए। मेरी भौजी जब भी देस से लौटती थी तो उनकी जुबाँ पर वहीं के किस्से हुआ करते थे कुछ लखनऊ वाली मौसी के, शिवगढ़ वाले मामा के और कभी लाल की दुल्हिन के जैसे वो सब मेरी जिंदगी का एक हिस्सा बन चुका थे इन किस्सों के सहारे लेकिन इनमें से मैं किसीसे भी नही मिला था न ही पहचानता था उन्हें।

छियालीस की इस उम्र तक आते, अपने देश के बहुत व्यापारिक हिस्से को देख चुका था (आखिर नौकरी जो न कराए/दिखाए वो कम) और हिन्दुस्तान से बाहर जापान, हांगकाँग, चीन और हिन्दी, अंग्रेजी, के अलावा मराठी बोलने समझने लगा हूँ और गौरतलब है कि जापानी भी इस हद तक बोल/समझ सकता हूँ अपने प्रश्न पूछ सकूँ और उनके उत्तर समझ सकूँ। लेकिन अपने गाँव, देस को न देख पाने की कसक जरूर सालती थी। ऐसा लगता था कि जैसे अभी बहुत कुछ छूटा हुआ अपना देस ही नही देखा, पुरखों की ज़मीन पर कदम नही रखा और आसमान में उड़ने की बातें करता हूँ। हाँ एक बात जरूर सीख चुका था कि उन्नाव, कानपुर, रायबरेली, कन्नौज, लखनऊ, इलाहाबाद आदि शहरों ने हिन्दी साहित्य को अपने पूतों से समृद्ध किया है (हमारे दिनों में तो हिन्दी की परीक्षा में कवि, लेखक की जीवनी याद करनी ही होती थी, खैर अब न तो स्कूल में हिन्दी की बात होती है और न हिन्दी में)।

अपने पिता (श्री रामप्रकाश तिवारी "निर्मोही") से मेरा विरोध न जाने कैसे और क्यों रहा यह तो मैं भी नही जान पाया हूँ, उन्होंने कहानियाँ लिखी और अपना नाम किया (यह मेरे लिए गर्व का विषय है कि जिस आदमी ने रोटी के लिए संघर्ष अपने बचपन से शुरू किया हो और खुदको एक कहानीकार के रूप में स्थापित किया हो)। मैं अपनी बात पर आता हूँ चूंकि वो कहानी लिखते थे तो मैं कविता लिखूंगा और शायद यही एक वज़ह(प्रेरणा) रही हो कि मैं लिखने लगा। फिर अपने कॅरियर के लिए जैसे सब कूछ भूल गया था लेकिन फिर वो दबी हुई चिंगारी भड़कने लगी 1986 में नौकरी तक आते आते। मैं अब तक तो केवल यही महसूस करता कि मै केवल अपने लिए लिख रहा हूँ तो क्यों किसीको छापने के लिए भेजूं और छपने की प्रतीक्षा इसलिए डायरियाँ भरता रहा। 2008 में जैसे मुझे पंख उग आए हों और यह मेरा ब्लॉगिंग से पहला सरोकार था (इस हेतु मैं श्री रवि रतलामी जी की शुक्रगुजार हूँ)।

अपनी किताब "शब्दों की तलाश में" के बाद रश्मिप्रभा जी के संकलन "खामोश, खामोशी और हम" का 2012 में प्रकाशित होना और फिर "गुंजन सप्तक" के संकलन में मेरी कविताओं को लिया जाना बड़ा सुखद था। लेकिन मन में अपने वर्चुअल दोस्तों से रूह-ब-रूह मिलना एक ख्वाब सा ही था, लेकिन तभी परिकल्पना-तस्लीम की ओर से अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगिंग सम्मेलन में भाग लेने का आमंत्रण मिला। अपने कैलेण्डर पर नज़र डालता हूँ तो यह लगता है कि नही पहुँच पाऊंगा 23 अगस्त 2012 को इन्दौर से बैंगलुरू के लिए निकलना है, 24 को वर्चुआल बाहा के लिए बैंगलुरू इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी में खटना है, फिर 25 की अलसुबह वेल्लोर इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, वेल्लोर का थकाऊ सफर कर देर रात बैंगलुरू लौटना है फिर 26 की देर रात 03 बजे इन्दौर के लिए पुनः लौटने के लिए निकलना है। बैंगलुरू में नया एयरपोर्ट इतना दूर क्यों है? फिर 27 की सुबह इन्दौर से लखनऊ के लिए निकलना न बाबा ना अब तक तो मन बना चुका था कि रविन्द्र प्रभात जी से क्षमा माँग लूंगा......

पढते रहियेगा बहुत कुछ लिखा जाना शेष है.............
 

12 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

आगे के विवरण का इन्तजार है

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

इस पोस्ट के माध्यम से आप विशुद्ध साहित्यिक संस्मरण को मूर्तरूप देने जा रहे हैं । अच्छा लगा पढ़कर । आगे की कड़ी मे कार्यक्रम के समस्त पहलूओं पर वेबाक लिखें और कुछ सुझाव भी हो तो अबश्य दर्शाएँ । मुझे व्यक्तिगत खुशी होगी ।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

इस पोस्ट के माध्यम से आप विशुद्ध साहित्यिक संस्मरण को मूर्तरूप देने जा रहे हैं । अच्छा लगा पढ़कर । आगे की कड़ी मे कार्यक्रम के समस्त पहलूओं पर वेबाक लिखें और कुछ सुझाव भी हो तो अबश्य दर्शाएँ । मुझे व्यक्तिगत खुशी होगी ।

SR Bharti ने कहा…

बहुत सुंदर श्रीमान , आगे भी जानकारी देतें रहे .

अरविन्द शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़िया संस्मरण, भाषा शैली बेहद उम्दा । आगे की कड़ियों का बेसब्री से इंतजार है ।

ब्रजेश सिन्हा ने कहा…

आशा करता हूँ की आप पूरी ईमानदारी के साथ इसे एक संसमरणात्मक रपट मेन परिवर्तित करने मे सफल होंगे ।

प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ ने कहा…

bahut badhiyaa aur prerak report .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रोचक विवरण है आपकी और जीवन यात्रा का भी ...

Markand Dave ने कहा…

बहुत ही बढ़िया शुरूआत । धन्यवाद ।

रणधीर सिंह सुमन ने कहा…

namaskar.nice

Archana ने कहा…

ह्म्म्म...मैंने भी देखा ....अच्छा लगा ...लेकिन आपके साथ यात्रा कर लेते हैंतब नहीं तो अब सही..:-)

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया संस्मरण आगे की कड़ियों का इंतजार है